बोम्बे हाई कोर्ट केस के अखबार, फेब्रुअरी १३, १४ और १६ २०१८

अल दाई अल अजल सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. की ज़बानी बोम्बे हाई कोर्ट में १३ वी फेब्रुअरी २०१८ के रोज़ दोपहर १२ बजे शुरू हुइ। सैयदना फखरुद्दीन ने दावत के केस नं ३३७/२०१४ में वादी की हैसियत से गवाही दी। नामदार जस्टिस गौतम पटेल के कोर्ट में कार्यवाही हुइ।

शेह्ज़ादा मुफद्द्ल सैफुद्दीन (प्रतिवादी) के वकील सीनियर काउन्सिल मोहतरम इक़बाल चागलाने सैयदना फखरुद्दीन से कई सवाल पूछे।

१३वि फेब्रुअरी के दिन, प्रतिवादी शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुद्दीन के सीनियर काउन्सिल श्री इकबाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन से पूछा कि सैयदना ताहेर सैफुद्दीन अपनी रिसालत में फरमाते है कि नस “लोगो” के दरमियान होनी चाहिए । सैयदना ने फरमाया कि रिसालत में दरअसल अरबी शब्द “जमाअत” का प्रयोग किया गया है । रसूलुल्लाह स.अ. ने खुद फरमाया है कि एक अकेला मुमिन भी “जमाअत” है (المؤمن وحده جماعة). मनसूस खुद, अकेले ही, नस्स के शाहिद हो तो भी नस्स वैध है।

श्री चागला ने पूछे हुए एक सवाल, कि क्या नस्स स्पष्ट रूप से होनी चाहिए तो सैयदना ने जवाब फरमाया की नस्स स्पष्ट शब्दों में या स्पष्ट इशारे से होनी चाहिए, जैसे दाउदी बोहरा के मिसाक में ज़िक्र आती है ।

१४वि फेब्रुअरी को, श्री चागला ने इस्माइल बिन अब्दुर्रसूल अल-उज्जैनी (अल-मज्दू) द्वारा लिखी गई फेहरिस्त, जिस में इस्लामी उसूल, क़ानून, तारीख और फलसफत पर लिखी गई कई मोअतबर किताबो की फेहरिस्त बनाई गयी है, उस पर सैयदना से सवाल किया कि क्या आप इस फेहरिस्त को आधिकारिक मान्यता देते है, तो सैयदना ने फरमाया कि यह पूर्ण रूप से स्वीकृत नहीं है क्योंकि इसके लेखक ने, जिसे समाज में अल-मज्दू के नाम से जाना जाता है, उस लेखक ने ४० व़े दाई के खिलाफ़ दुश्मनी और बगावत की थी ।

अल-मज्दू के किताब के बारे में श्री चागला के अन्य प्रश्नों को जस्टिस गौतम पटेल ने यह कर अनुमति नहीं दी कि आप पहले यह साबित करें कि क्या बोहरा समाज में अल-मज्दू की किताब को मान्यता प्राप्त है।

आप के इस जवाब के सुबूत के तौर पर अगले दिन १६ फेब्रुअरी को सैयदना ने कोर्ट में ५२वे दाई सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन रि.अ. के बयान की वीडियो रेकोर्डिंग पेश की जिसमे आप फ़रमाते है कि दुश्मन मज्दू की कोई भी तसव्वुर को मुमिनीन को माननी नहीं चाहिए और उसके सभी लेखो से बहुत संभालना चाहिए।

श्री चागला ने कोर्ट में ५१ व़े दाई सैयदना ताहेर सैफुद्दीन साहब रि.अ. के बयान की एक ऑडियो रेकोर्डिंग पेश की और शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुद्दीन की तरफ़ से कोर्ट को यह बताया गया कि इस रेकोर्डिंग में नस्स के बारे में ५१ व़े दाई यह फरमाते है कि नस्स के शाहिदों का होना ज़रूरी है । सैयदना फखरुद्दीन की तरफ से इसी रेकोर्डिंग की, कंप्यूटर पर स्पष्ट की हुइ प्रती कोर्ट में पेश करके सुनाई गई, और सैयदना ने फरमाया कि इस रेकोर्डिंग में कहीं भी अन्य शाहीदो की हाज़री ज़रूरी होने की चर्चा ही नहीं है। हकीकत तो यह है कि सैयदना ताहेर सैफुद्दीन ने “शाहीदो” नहीं फरमाया है बल्के आप ने “कागज़ों” फरमाया है जो स्पष्ट सुनाई दिया जाता है। जस्टिस गौतम पटेल ने शब्दों में किये गए इस गंभीर फर्क को नोट कर लिया और कहा कि इसकी अलग तौर पर विशेष जांच होगी।

श्री चागला ने सैयदना से पूछा की क्या २७वे दाई, सैयदना दाऊद बिन क़ुतुबशाह के पास, आप के पद के दावेदार सुलेमान के खिलाफ, अपनी विधिवत नस्स के बारे में  कोई और सबूत मौजूद था, सिवा इस हकीकत के कि आप २६ वे दाई, सैयदना दाऊद बिन अजबशाह के माज़ून थे। सैयदना ने फरमाया कि हाँ, २५ व़े दाई, सैयदना जलाल शम्सुद्दीन ने बयान दिया था कि आप के ख्व़ाब में इमाम ने तशरीफ़ लाकर आप को हुक्म फरमाया कि आप “दोनों दाउद” को, आप के बाद, २६ व़े और २७ व़े दाई के मकाम में काइम करो। सैयदना ने फ़माया की जब २६ व़े दाई ने २७ व़े दाई को अपना मनसूस काइम किया, तब कुछ लोगो ने ऐतराज़ किया। २६ व़े दाई ने ऐतराज़ के लोगो को जवाब दिया कि दरअसल २५ व़े दाई ने ही आपको (२६वे दाई को) सैयदना दाऊद बिन क़ुतुबशाह को अपना मनसूस काइम करने की वसियत की थी।

सैयदना ताहेर फखरुद्दीन ने यह भी कोर्ट को बताया कि ५१वे दाई सैयदना ताहेर सैफुद्दीन ने अपनी रिसालत शरीफ में लिखा है कि सुलैमान सैयदना क़ुतुबशाह के सामने कई सालों तक सजदा बजाता था और मानता था कि आप पर नस्स हुइ है, कुछ साल के बाद उसने दावा कर दिया।

(प्रतिवादी शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुदीन (प्रतिवादी) भी कई सालों तक मूल वादी सैयदना खुज़ैमा कुत्बुद्दीन रि.अ. के सामने सजदा बजाया करते थे, जिसकी विडिओ रेकोर्डिंग बतौर सबूत कोर्ट में पेश की गयी है ।)

माननिय जस्टिस गौतम पटेल ने आगे कार्यवाही के लिये २१ और २२ वी मार्च २०१८ की तारीख़ तय की है और आगे ज़रुरत होने पर १०, ११ व १३ अप्रैल २०१८ को कार्यवाही होगी।