बोम्बे हाई कोर्ट केस के अखबार, २१ और २२ मार्च, २०१८

अल दाई अल अजल सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. की ज़बानी बोम्बे हाई कोर्ट में २१ वी मार्च २०१८ के रोज़ दोपहर को दोबारा शुरू हुइ। सैयदना फखरुद्दीन ने दावत के केस नं ३३७/२०१४ में वादी की हैसियत से गवाही दी। नामदार जस्टिस गौतम पटेल के कोर्ट में ज़बानी हुइ।

कुल मिलाकर चार सत्रों में शेह्ज़ादा मुफद्द्ल सैफुद्दीन (प्रतिवादी) के वकील सीनियर काउन्सिल मोहतरम इक़बाल चागलाने सैयदना फखरुद्दीन से ७८ सवाल पूछे। सन २०१५ में केस में ज़बानी शुरू हुइ और सैयदना कुत्बुद्दीन रि.अ. से ५४४ सवाल पूछे गए, और सैयदना फखरुद्दीन की ज़बानी शुरू हुइ तब से आप को ७३३ सवाल पूछे गए है । सैयदना कुत्बुद्दीन और सैयदना फखरुद्दीन को कुल मिलाकर अब तक १२७७ सवाल  पूछे गए है ।

इक़बाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन को एक हस्तलिखित किताब बताई। सैयदना ने फरमाया कि आप इस किताब से वाकिफ़ नहीं है। इक़बाल चागला के कहने पर सैयदना ने उस किताब में से बताए गए कुछ अंश पढ़े। फिर आप से सवाल पूछा गया कि क्या इस किताब में यह लिखा गया है कि २५ व़े दाई सैयदना जलाल रि.अ. ने २६ व़े दाई सैयदना दाउद बिन अजबशाह पर नस्स दावत के लोगो (people of Dawat)दरमियाँ फरमाई? सैयदना ने फरमाया कि हां, इस किताब में वैसा लिखा गया है, सैयदना ने उस किताब में से फिर आगे पढ़ कर और यह फरमाया कि इस किताब में यह बात गलत लिखी गई है कि दावत के लोगो ने २६ व़े दाई को दावत सोंपी। आप ने आगे खुलासा फरमाया कि दावत के लोगो को यह हक्क नहीं है कि दावत मनसूस को सौंपे, सैयदना हमीदुद्दीन किरमानी रि.अ. (हाकिम इमाम के बाब उल अबवाब) ने यह फरमाया है कि चाहे तमाम आलम के लोग यह शहादत दे कि यही वारिस है, मगर इस शहादत की कोई एहेम्मियेत या गिनती नहीं जब तक इमाम या दाई ने नस्स न फरमाई हो। इस वजह से इमाम या दाई ही अपने मनसूस को दावत सौंपते है।

इक़बाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन से सवाल पूछा कि क्या आप के पास कोई लिखित सुबूत है कि २७ व़े दाई सैयदना दाउद बिन कुतुबशाह हक्क पर थे इस बात की सब से एहेम दलील यह थी कि आप २६ व़े दाई के माजून थे? जवाब में सैयदना ने फरमाया कि हाँ, सैयेदी हसन बिन इदरीस के किताब “अल बुरहान उल जलीयाह” में यह लिखा गया है।

इक़बाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन से पूछा कि जिस ख़त में (सिजिल्ल उल बिशारत) २० व़े इमाम ने २१ व़े इमाम को काइम करने की खबर दी उस ख़त के मौलातुना हुररत उल मलेका शाहिद थे। सैयदना फखरुद्दीन ने फरमाया कि आप शाहिद नहीं थी। फिर इक़बाल चागला ने सैयदना द्वारा कोर्ट में दर्ज की गई एफिडेविट ऑफ़ एविडेंसAffidavit of Evidence) में से यह जुमले सैयदना को दिखलाए जिस मे सैयदना ने फरमाया था कि २० व़े इमाम ने “मौलातुना हुररत उल मलेका को नस्स के बारे में – जो आप ने सिजिल्ल उल बिशारत में की – आप अकेले को ही शाहिद इख्तियार किया था”। इक़बाल चागला ने पूछा कि इन दोनों में से क्या सही है? सैयदना फखरुद्दीन ने फरमाया कि दोनों ही सही है। जो सवाल आप से आज किया गया उसके जवाब में आप की मुराद यह है कि मौलातुना हुररत उल मलेका, जब इमाम ने सिजिल्ल उल बिशारत खत लिखा, तब आप मिस्र में हाज़िर नहीं थी और ख़त के लिखे जाने की शाहिद नहीं थी.(मौलातुना हुररत उल मलेका उस वक्त यमन में थी) और सैयदना ने एफिडेविट ऑफ़ एविडेंस में जो पहले कहा वह यह कि मौलातुना हुररत उल मलेका ने नस्स की अकेले ही शहादत दी कि २१ व़े इमाम तैयेब इमाम है और आप की इस शहादत के सबब सतर की दावत २१ व़े इमाम के नाम से काइम है।

इक़बाल चागला ने सैयदना से सवाल पूछा की आप ने जो कहा कि सुलेमान नबी अ.स. ने आप के वारिस पर पहली बार नस्स खानगी में (गोपनीय तरीके से) की, किसी अन्य व्यक्ति को शाहिद नहीं रखा (मतलब सिर्फ सुलेमान नबी और आप के मनसूस ही हाज़िर थे) आप का यह कहना किस बुनियाद पर है ? सैयदना फखरुद्दीन ने फरमाया की सुलेमान नबी ने पहली बार नस्स खानगी में फरमाई यह बयान सैयदना क़ाज़ी अल नौमान रि.अ., जो इमाम के दाई और क़ाज़ी अल कुज़ात (चीफ जस्टिस) थे आप ने अपने किताब असास उत तावील में लिखा है । इसी किताब में सैयदना क़ाज़ी अल नौमान  बयान फरमाते है कि जिस वक्त सुलेमान नबी ने अपनी आखरी उम्र में दोबारा नस्स फरमाई तो उस दावत के हुदूद ने यह कहा कि अगर इस बात का हमें पहले इल्म हो जाता कि मनसूस कौन है तो व़े इस अज्ञानता की मेहनत को नहीं भुगतते। सैयदना क़ाज़ी अल नौमान इस वाकए के बारे में कुरआन मजीद की एक आयत का भी बयान फरमाते है।

इक़बाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन से पूछा की आप ने फरमाया के अमीरुल मुमिनीन मौलाना अली स.अ. को इशारे से काइम किया गया (स्पष्ट शब्दों में नहीं)(not by direct statement) तो आप की क्या मुराद है? तब सैयदना ने फ़रमाया कि रसूलुल्लाह स.अ. ने आप के बयान में अली का नाम आप के नाम के साथ जोड़ कर फरमाया और हाज़रीन के लिये इशारा फ़रमाया कि अली आप के वारिस है। रसूलुल्लाह स.अ. ने फरमाया कि “जिसका मौला मै हु, अली उसके मौला है” इक़बाल चागला ने फिर सैयदना से पुछा कि क्या रसूलुल्लाह स.अ. ने मौलाना अली स.अ. को लोगो के दरमियाँ काइम फरमाया (public anointment)? सैयदना ने फरमाया कि हाँ यह बात सही है।

इक़बाल चागला ने सैयदना से पूछा कि क्या आप ५१ व़े दाई के ख़त से आशना (परिचित) है तो सैयदना ने फरमाया कि एक हद्द तक आशना है। इक़बाल चागला ने फिर पूछा कि क्या अप ५१ व़े दाई के ख़त को देखकर पहचान लोगे? सैयदना ने फरमाया कि ख़त के नमूने देखकर बताया जा सकता है।

इक़बाल चागला ने सैयदना को कुछ बाइंडिंग किये गए कागज़ो को पेश किया, जो हिस्सा सैयदना को बताया गया वह हाथ से की गई लाइन वाले कागज़ पर पेन्सिल से लिखा था। इक़बाल चागला ने सैयदना से पूछा की क्या आप मानते है कि यह ५१ व़े दाई के हाथ से लिखे ख़त है? सैयदना ने फरमाया कि नहीं । इक़बाल चागला ने पूछा कि आप पहचान पाते हो कि यह किसके ख़त है? सैयदना ने फरमाया नहीं।

इक़बाल चागला ने सैयदना से पूछा कि क्या इस कागज़ में यह नहीं लिखा गया कि नस्स खानगी में हो (गोपनीय तरीके से) फिर भी ४ या २ शाहिदो की हाज़री में ही होनी चाहिए(must be done)? जवाब में सैयदना फखरुद्दीन ने फरमाया कि यह नहीं लिखा गया है कि ४ या २ शाहीदो की हाज़री में ही नस्स होनी चाहिए,(must be done) बलके यह लिखा गया है कि ४ या २ शाहीदो की हाज़री में भी नस्स हो सकती है(it may be done), और यह भी लिखा है कि दाई को इस बारे में पूरा इख्तियार है, और जैसे व़े चाहे, कर सकते है।

नामदार जस्टिस गौतम पटेल ने आइन्दा सैयदना के क्रोस एक्जामिनेशन के लिये १३ अप्रैल, २०१८ की तारीख मुक़र्रर की है।