लीगल अपडेट – कोर्ट केस के अखबार – ता: ८, ११ व १२ दिसंबर २०१७

८ दिसंबर २०१७ के दिन, दोपहर १२ बजे बॉम्बे हाई कोर्ट के तारीखी कोर्ट रूम, रूम नंबर ४६ में अल-दाई अल-अजल सैयदना ताहेर फखरुद्दीन (त.उ.श.) की गवाही शुरू हुई. आपने दावत के केस नंबर ३३७/२०१४ में प्लेंटिफ की हैसियत से गवाही दी. नामदार जस्टिस गौतम पटेल के कोर्ट में यह कार्यवाही हुई.

सैयदना (त.उ.श.) (प्लेंटिफ) ने मुतबर्रक कुरआने मजीद को हाथ में ले कर कसम खाई और बिस्मिल्लाह पढके गवाही शुरू फरमाई.

पहले सैयदना (त.उ.श.) को आपके वकील श्री आनंद देसाई ने सवालात पूछे. नामदार जस्टिस गौतम पटेल ने भी कई सवालात पूछे.

श्री आनंद देसाई ने सैयदना (त.उ.श.) को दाउदी बोहरा कौम के इतिहास के बारे में प्रश्न पूछाs. सैयदना ने फरमाया कि दाउदी बोहरा कौम इस्माईली शिआ है जो इमाम इस्माईल (अ.स.) के अत्बा है और इस्माईली शिआ की मान्यता है कि वारिस पर की गई नस्स को कभी भी बदला नहीं जाता है और न कभी वापस लिया जाता है. यह मान्यता दाउदी बोहरा कौम के अकीदे के बुनियादी उसूलों में से है. यह मान्यता इस्माईली शिआ के अलावा दूसरें लोग जो मूसा काज़िम को इमाम मानते है उनसे अलग है. मूसा काज़िम के अत्बा यह मानते है कि इस्माईल इमाम पर की हुई नस्स वापस ले ली गई और इमाम जाफरुस सादिक (अ.स.) ने मूसा काज़िम पर नस्स फरमाई.

(इस केस के मुद्दों में से एक अति महत्त्व का मुद्दा यह है कि शेहज़दा मुफद्दल सैफुद्दीन (प्रतिवादी/डिफेन्डंट) का यह कहना है कि नस्स बदली भी जा सकती है और वापस भी ली जा सकती है)

उसके बाद श्री आनंद देसाई ने सैयदना से पूछा कि दाउदी बोहरा कौम में इल्म के स्रोत कौन से है. सैयदना ने जवाब फरमाया कि किताबों की तरतीब में सब से ऊँचे स्थान पर कुरआने मजीद है. उसके बाद रसुलुल्लाह (स.अ.व.) की हदीस और अइम्मत के कलाम. दोआतों की किताबों का भी यही दरजा है. सैयदना ने तफसीर फरमाई कि किताबों में जो इल्म है वह लिखित है और उस इल्म का अर्थ जो दोआतों ने मौखिक रूप से अपने बयानो फरमाया है वह सब से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वह किताबों में लिखित इल्म का सही अर्थ है.

सैयदना ने फरमाया कि इस केस में अकीदे के बारे में उमूर में अपनी बात साबित करने के लिए आप ५१ वे दाई सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) और ५२ वे दाई सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन (री.अ.) के मौखिक बयानों और तफसीरों का उपयोग करेंगे.

जस्टिस गौतम पटेल ने सैयदना को पुछा कि नस्स करते समय या उसके बाद क्या यह अनिवार्य है कि अन्य लोगों को भी नस्स के बारे मे सूचित किया जाए ? सैयदना ने फरमाया कि ऐसा ज़रूरी या अनिवार्य नहीं है कि दूसरों को पता हो, और फरमाया कि तारीख में ऐसे कई उदाहरण है कि नस्स करने के बाद उसे अत्यंत गुप्त रखा जाए. इसका एक कारण यह भी है कि मनसूस के खिलाफ के लोग दोआत के सिलसिले में खलल करने की कोशिष न कर पाए.

श्री आनंद देसाई ने सैयदना को पूछा कि जब मन्सूस अपने नास की हयाती में ही अर्थात गादी नशीन होने से पहले ही वफात हो जाए, तो क्या प्रावधान है. सैयदना ने जावाब फरमाया कि जब मन्सूस पर नस्स कर दी जाए तो मन्सूस इस आलम मे – दुनिया मे – उस आला मकाम में पहुँच ही जाते है और फिर जन्नत में भी उसी आला मकाम में पहुँचते है. अगर मन्सूस दाई की हयात में वफात हो जाए तो दाई नस्स कर के दूसरें मन्सूस को काइम फरमाते है. इस बात को साबित करने के लिए सैयदना ने कुछ मिसालें दलील के रूप में पेश की. उन में से एक सुरतुल मरियम की ५३ वी आयत बताई. इस आयत में हारुन (अ.स.) को, जो मूसा नबी (स.अ.) के मन्सूस है, उन्हें कुरआने मजीद में मूसा के मकाम में अर्थात नबी के मकाम में बताया गया है. हारुन (अ.स.) के वफात के बाद मूसा (स.अ.) नबी ने दूसरें मन्सूस को काइम फरमाया.

श्री आनंद देसाई ने सैयदना से पूछा कि इबादत के सजदे में और वह सजदे में जो इमाम और दाई को किया जाता है उसमें क्या फर्क है? सैयदना ने फरमाया कि इबादत का सजदा सिर्फ अल्लाह तआला को किया जाता है. जो सजदा इमाम या दाई को किया जाता है उसे तक्बीलुल अर्द (यानी ज़मीन को चूमना) भी कहते है और यह एहतेराम व अज़मत की निहायत है.

(यह बहुत अहम मसला है क्योंकि सैयदना ने कोर्ट में यह पेश किया है कि सजदा सिर्फ इमाम, या आप के मनसूस जो इमाम बनेंगे, दाई या या आप के मनसूस जो दाई बनेंगे, उन्हें ही किया जा सकता है. शेहज़दा मुफद्दल सैफुद्दीन (डिफेन्डंट) और उनके भाई सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) को सजदा करते थे.)

श्री आनंद देसाई ने सैयदना से यह भी पूछा कि ऐसे कोइ जुमले है जिनका उपयोग दाई और माज़ून को साथ में जोड़ कर संबोधन किया जाता है. सैयदना ने मिसाल की तौर पर इन जुमलों की ज़िकर फरमाई

  • माज़ून दाई के दाहिने हाथ (यमीन) है और दाई के साथ दावत काइम करते है.
  • दाई और माज़ून मुमेनीन के रूहानी बावा और माँ है.
  • माज़ून दाई के सच्चे दोस्त (सदीक) है और मुमेनीन पर शाहिद है.

सैयदना ने उन तस्वीरों के बारे में भी गवाही दी, जो आपने ली थी, जब सैयदना बुरहानुद्दीन (री.अ.) उस मिसाल (सन्देश/पत्र) को पढ़ रहे थे जिसे सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) ने सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) को अपने ही ख़त से लिखा था. सैयदना बुरहानुद्दीन (री.अ.) और सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) इन तस्वीरों में साथ नज़र आते है. उस मिसाल में ५१ वे दाई सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) ने स्पष्ट संकेत दिए है कि सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) ५३ वे दाई काइम होंगे.

नामदार जस्टिस गौतम पटेल ने सैयदना से पूछा कि आप ५१ वे दाई और ५२ वे दाई की वाअज़ों की ऑडियो वीडियो रेकोर्डिंग पर किस वजह से निर्भर होना चाहते है? सैयदना ने जवाब फरमाया कि इन रेकोर्डिंग पर आपका एतेमाद इसलिए है क्योंकि अकीदे के कईं महत्त्व के उसूलों के बारे में उनके बयान आधिकारिक और प्रामाणित है, जैसे:

  • नस्स खानगी या गुप्त तरीके से भी की जा सकती है.
  • मन्सूस अपने आप के लिए और अपने हक में शहादत/गवाही दे सकते है यह बताने के लिए कि दाई ने उन पर नस्स फरमाई है.
  • नस्स इशारे से हो सकती है.
  • एक बार नस्स कर दी जाए फिर वह बदली भी नहीं जा सकती और वापस भी नहीं ली जा सकती.
  • माज़ून का आला मरतबा और माज़ून की विश्वसनीयता साबित करने के लिए.

सैयदना के परिक्षण (अं: एक्जामिनेशन इन चीफ) के बाद शेहज़दा मुफद्दल सैफुद्दीन (डिफेन्डंट) के वकील श्री इकबाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन (...) का परीक्षण (अं: क्रोस एक्जामिनेशन) शुरू किया.

श्री इकबाल चागला ने सैयदना को आपकी हयात के बारे में कई प्रश्न पूछे खास कर के आपकी तालीम के बारे में, आपके निवासस्थान के बारे में, आपके व्यवसाय के बारे में और आपके पारिवारिक मामलों के बारे में.

श्री चागला ने सैयदना को दावत के उन असरार और खास इल्म के बारे में पूछा जिस इल्म से सैयदना कुत्बुद्दीन ने आपको नवाज़ा और यह भी पूछा की यह इल्म देने का उद्देश्य क्या था. सैयदना ने जवाब फरमाया कि यह खास इल्म आपको इसलिए बख्शा गया ताकि आप दाई और दावत की खिदमत कर सके. श्री चागला ने पूछा कि सैयदना कुत्बुद्दीन को सैयदना फखरुद्दीन से, दाई और दावत की खिदमत की कैसी उम्मीदें थी. सैयदना ने जवाब दिया कि यह उम्मीद थी कि जिस तरह सैयदना कुत्बुद्दीन ने दाई और दावत की खिदमत की, इखलास व नशात से, उसी तरह आप भी खिदमत करे.

श्री चागला ने सैयदना से पूछा कि जब कभी यह विवाद हो  कि दाई कौन है, तो इस इख्तिलाफ को सुलझाने में माज़ून की क्या भूमिका होती है? सैयदना फखरुद्दीन ने फरमाया कि इतिहास में हुए ऐसे विवाद के समय में माज़ून के कौल (कथन) को मौतमद (विश्वसनीय) और आधिकारिक माना गया है.

सैयदना से पूछा गया कि आपको कब यह मालूम हुआ के आपके वालिद ५३ वे दाई सैयदना कुत्बुद्दीन ५२ वे दाई सैयदना बुरहानुद्दीन के वारिस है. आपने फरमाया कि यह एहसास धीरे धीरे होता गया. छोटी आयु से धीरे धीरे यह मालूमात हासिल हुई और ५२ वे दाई के शेहजादें व शेहज़ादियां जिनमें शेहज़दा मुफद्दल सैफुद्दीन (डिफेन्डंट) भी शामिल है, वे सब सैयदना कुत्बुद्दीन को सजदा करते थे और ५२ वे दाई और सैयदना कुत्बुद्दीन को साथ में “बेवे मौला” (दोनों मौला) कह कर संबोधित करते थे। आपने फरमाया कि इन आमाल से भी मुझे इल्म हुआ.

श्री चागला ने सबूत के तौर पर अख़बार में प्रकाशित हुए एक लेख को कोर्ट में पेश किया. पहले इसी लेख को सैयदना कुत्बुद्दीन ने अपने प्लेंट (वाद-पत्र) में पेश किया था लेकिन उस समय शेहज़दा मुफद्दल सैफुद्दीन (डिफेन्डंट) ने इसे कबूल नहीं किया था. इस लेख में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस) नामदार जस्टिस अज़ीज़ अहमदी द्वारा जारी किये गये बयान का उल्लेख था कि, “मैंने दस्तावजों को गौर से पढ़ा और जांचा है और इस निष्कर्ष पर आया हूँ कि सैयदना कुत्बुद्दीन का कहना कि वे ५३ वे दाई है, यह सिद्धांतों पर आधारित है.” (“ I examined the documents and I beleive that Syedna Qutbudin’s stand of the 53 rd Dai is principled”)

जस्टिस गौतम पटेल ने इस लेख को शेहज़दा मुफद्दल सैफुद्दीन (डिफेन्डंट) का दाखला (exhibit) मानते हुए मंज़ूर किया है और रेकॉर्ड पर ले लिया है.

जस्टिस गौतम पटेल ने सैयदना फखरुद्दीन (प्लेंटिफ) के परिक्षण (cross examination) के लिए तारीख ८,९ और १२ जनवरी, २०१८ निर्धारित की है.