बोम्बे हाई कोर्ट केस के अखबार, १३ अप्रैल २०१८

अल दाई अल अजल सैयदना ताहेर फखरुद्दीन (त.उ.श.) की ज़बानी बोम्बे हाई कोर्ट में १३ वी अप्रैल २०१८ के रोज़ दोपहर के वक़्त दुबारा शुरू हुई. सैयदना फखरुद्दीन ने दावत के केस नं. ३३७/२०१४ में वादी की हैसियत से गवाही दी. नामदार जस्टिस गौतम पटेल के कोर्ट में ज़बानी शुरू हुई.

कुल मिलाकर दो सत्रों में शेह्ज़दा मुफद्दल सैफुद्दीन (प्रतिवादी) के वकील सीनियर काउन्सिल मोहतरम इकबाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन से ३० सवाल पूछे. साल २०१५ में केस में ज़बानी शुरू हुई और सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) से ५४४ सवाल पूछे गए, और सैयदना फखरुद्दीन की ज़बानी शुरू हुई तब से आप को ७६३ सवाल पूछे गए है. सैयदना कुत्बुद्दीन और सैयदना फखरुद्दीन से कुल मिलाकर अब तक १३०७ सवाल पूछे गए है.

इकबाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन को कुरआन मजीद में से कुछ आयतें दिखाई और पूछा कि क्या इन आयतों में यह बताया गया है कि वसीयत (वसीयतनामा) के लिया मर्दों में से २ शाहिदों (साक्षी) की ज़रुरत है? सैयदना फखरुद्दीन ने फरमाया कि ऐसा नहीं है. यहाँ दुनियावी वसीयत करने के बारे में बताया गया है और ऐसी वसीयत करने के १ या २ वैध तरीके बताए गए है. इकबाल चागला ने फिर पुछा कि ऐसी कौन सी वसीयत है जो दुनियावी नहीं होती? सैयदना ने फरमाया कि नस्स (एक दाई का अपने जानशीन को काइम करना) भी एक तरह की वसीयत है लेकिन वह सिर्फ दुनियावी उमूर के लिए नहीं होती.

इकबाल चागला ने सैयदना से पुछा कि क्या वसीयत का मतलब “विल” (वारिस नामा) है? सैयदना फखरुद्दीन ने जवाब फरमाया कि यह  “वसीयत” के लफ्ज़ की प्रचलित माना है. किसी को नसीहत करना, सलाह देना कि इस तरह बर्ताव करना चाहिय, इस तरह अमल करना चाहिए, या किसी को आदेश देना, इसे भी वसीयत कहा जा सकता है.

फिर सैयदना फखरुद्दीन से यह सवाल किया गया कि क्या नस्स दाउदी बोहरा कौम के मज़हबी सिद्धांतों के अनुसार एक वसीयत है?  सैयदना ने फरमाया कि हाँ, और आपने यह स्पष्ट किया कि वह वसीयत जो नस्स है, वह दुनियावी वसीयत से कई पहलुओं में अलग है.

इकबाल चागला ने सैयदना को किताब मुख्तसरुल आसार (जो सैयदनल काज़ी अल-नोमान ने लिखी है जो इमाम मोइज़ के असरे मैमून में काज़िल कुज़ात थे (चीफ जस्टिस) और जिनका दावत के हुदूद में ऊँचा दर्जा था) में से एक लेख बताया और पुछा कि क्या वसीयत बिना शाहिद के की जा सकती है? सैयदना फखरुद्दीन ने फ़रमाया कि हाँ, की जा सकती है. आपने यह भी फरमाया कि सैयदनल काज़ी अल-नोमान दूसरें किताब में फरमाते है कि यदि तुम्हें कोई दूसरा शाहिद (निष्पक्ष गवाह) न मिलें तो भी वसीयत करो क्योंकि रसुलुल्लाह ने फरमाया है.

इकबाल चागला ने सैयदना को आपकी याचिका (प्लेंट) और एफिडेविट ऑफ एविडेंस दिखाई और पूछा कि क्या आपकी गवाही कि ७ वे दाई (सैयदना अहमद बिन अल-मुबारक री.अ.) ने आपके माज़ून ८ वे दाई (सैयदना हुसैन बिन अली री.अ.) पर खानगी तौर से नस्स की और यह नस्स का कोई भी बाहरी शाहिद नहीं था, सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) ने लिखी अरबी इबारत “फमा अशहदा अल-शोहदाअ ज़ाहेरन वमा नस्स अलैहे ज़ाहेरन” पर आधारित है, जो इबारत सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) की १३६३ ही. की रिसालत शरीफा “मशरबतो तस्नीमे नूर” में है? सैयदना ने फरमाया कि हाँ, और आपने यह भी फरमाया कि इसके अलावा यह गवाही ५२ वे दाई सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन के एक बयान के अनुसार भी है, जो आपने १० वी फ़रवरी २००५ के दिन आपकी वाअज़ में फरमाया था, कि ८ वे दाई ने यह शहादत दी कि आपके ऊपर ७ वे दाई ने नस्स की है और जबकी इस नस्स का कोई शाहिद नहीं था, आपकी (८ वे दाई की) शहादत काफी थी.

नामदार जस्टिस गौतम पटेल ने आइन्दा सैयदना के क्रोस एक्जामिनेशन के लिए ५ दिन मुक़र्रर किए है. २० और २१ वी जून और ३,४,५ वी जुलाई २०१८ की तारीखें दी है.

बोम्बे हाई कोर्ट केस के अखबार, २१ और २२ मार्च, २०१८

अल दाई अल अजल सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. की ज़बानी बोम्बे हाई कोर्ट में २१ वी मार्च २०१८ के रोज़ दोपहर को दोबारा शुरू हुइ। सैयदना फखरुद्दीन ने दावत के केस नं ३३७/२०१४ में वादी की हैसियत से गवाही दी। नामदार जस्टिस गौतम पटेल के कोर्ट में ज़बानी हुइ।

कुल मिलाकर चार सत्रों में शेह्ज़ादा मुफद्द्ल सैफुद्दीन (प्रतिवादी) के वकील सीनियर काउन्सिल मोहतरम इक़बाल चागलाने सैयदना फखरुद्दीन से ७८ सवाल पूछे। सन २०१५ में केस में ज़बानी शुरू हुइ और सैयदना कुत्बुद्दीन रि.अ. से ५४४ सवाल पूछे गए, और सैयदना फखरुद्दीन की ज़बानी शुरू हुइ तब से आप को ७३३ सवाल पूछे गए है । सैयदना कुत्बुद्दीन और सैयदना फखरुद्दीन को कुल मिलाकर अब तक १२७७ सवाल  पूछे गए है ।

इक़बाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन को एक हस्तलिखित किताब बताई। सैयदना ने फरमाया कि आप इस किताब से वाकिफ़ नहीं है। इक़बाल चागला के कहने पर सैयदना ने उस किताब में से बताए गए कुछ अंश पढ़े। फिर आप से सवाल पूछा गया कि क्या इस किताब में यह लिखा गया है कि २५ व़े दाई सैयदना जलाल रि.अ. ने २६ व़े दाई सैयदना दाउद बिन अजबशाह पर नस्स दावत के लोगो (people of Dawat)दरमियाँ फरमाई? सैयदना ने फरमाया कि हां, इस किताब में वैसा लिखा गया है, सैयदना ने उस किताब में से फिर आगे पढ़ कर और यह फरमाया कि इस किताब में यह बात गलत लिखी गई है कि दावत के लोगो ने २६ व़े दाई को दावत सोंपी। आप ने आगे खुलासा फरमाया कि दावत के लोगो को यह हक्क नहीं है कि दावत मनसूस को सौंपे, सैयदना हमीदुद्दीन किरमानी रि.अ. (हाकिम इमाम के बाब उल अबवाब) ने यह फरमाया है कि चाहे तमाम आलम के लोग यह शहादत दे कि यही वारिस है, मगर इस शहादत की कोई एहेम्मियेत या गिनती नहीं जब तक इमाम या दाई ने नस्स न फरमाई हो। इस वजह से इमाम या दाई ही अपने मनसूस को दावत सौंपते है।

इक़बाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन से सवाल पूछा कि क्या आप के पास कोई लिखित सुबूत है कि २७ व़े दाई सैयदना दाउद बिन कुतुबशाह हक्क पर थे इस बात की सब से एहेम दलील यह थी कि आप २६ व़े दाई के माजून थे? जवाब में सैयदना ने फरमाया कि हाँ, सैयेदी हसन बिन इदरीस के किताब “अल बुरहान उल जलीयाह” में यह लिखा गया है।

इक़बाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन से पूछा कि जिस ख़त में (सिजिल्ल उल बिशारत) २० व़े इमाम ने २१ व़े इमाम को काइम करने की खबर दी उस ख़त के मौलातुना हुररत उल मलेका शाहिद थे। सैयदना फखरुद्दीन ने फरमाया कि आप शाहिद नहीं थी। फिर इक़बाल चागला ने सैयदना द्वारा कोर्ट में दर्ज की गई एफिडेविट ऑफ़ एविडेंसAffidavit of Evidence) में से यह जुमले सैयदना को दिखलाए जिस मे सैयदना ने फरमाया था कि २० व़े इमाम ने “मौलातुना हुररत उल मलेका को नस्स के बारे में – जो आप ने सिजिल्ल उल बिशारत में की – आप अकेले को ही शाहिद इख्तियार किया था”। इक़बाल चागला ने पूछा कि इन दोनों में से क्या सही है? सैयदना फखरुद्दीन ने फरमाया कि दोनों ही सही है। जो सवाल आप से आज किया गया उसके जवाब में आप की मुराद यह है कि मौलातुना हुररत उल मलेका, जब इमाम ने सिजिल्ल उल बिशारत खत लिखा, तब आप मिस्र में हाज़िर नहीं थी और ख़त के लिखे जाने की शाहिद नहीं थी.(मौलातुना हुररत उल मलेका उस वक्त यमन में थी) और सैयदना ने एफिडेविट ऑफ़ एविडेंस में जो पहले कहा वह यह कि मौलातुना हुररत उल मलेका ने नस्स की अकेले ही शहादत दी कि २१ व़े इमाम तैयेब इमाम है और आप की इस शहादत के सबब सतर की दावत २१ व़े इमाम के नाम से काइम है।

इक़बाल चागला ने सैयदना से सवाल पूछा की आप ने जो कहा कि सुलेमान नबी अ.स. ने आप के वारिस पर पहली बार नस्स खानगी में (गोपनीय तरीके से) की, किसी अन्य व्यक्ति को शाहिद नहीं रखा (मतलब सिर्फ सुलेमान नबी और आप के मनसूस ही हाज़िर थे) आप का यह कहना किस बुनियाद पर है ? सैयदना फखरुद्दीन ने फरमाया की सुलेमान नबी ने पहली बार नस्स खानगी में फरमाई यह बयान सैयदना क़ाज़ी अल नौमान रि.अ., जो इमाम के दाई और क़ाज़ी अल कुज़ात (चीफ जस्टिस) थे आप ने अपने किताब असास उत तावील में लिखा है । इसी किताब में सैयदना क़ाज़ी अल नौमान  बयान फरमाते है कि जिस वक्त सुलेमान नबी ने अपनी आखरी उम्र में दोबारा नस्स फरमाई तो उस दावत के हुदूद ने यह कहा कि अगर इस बात का हमें पहले इल्म हो जाता कि मनसूस कौन है तो व़े इस अज्ञानता की मेहनत को नहीं भुगतते। सैयदना क़ाज़ी अल नौमान इस वाकए के बारे में कुरआन मजीद की एक आयत का भी बयान फरमाते है।

इक़बाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन से पूछा की आप ने फरमाया के अमीरुल मुमिनीन मौलाना अली स.अ. को इशारे से काइम किया गया (स्पष्ट शब्दों में नहीं)(not by direct statement) तो आप की क्या मुराद है? तब सैयदना ने फ़रमाया कि रसूलुल्लाह स.अ. ने आप के बयान में अली का नाम आप के नाम के साथ जोड़ कर फरमाया और हाज़रीन के लिये इशारा फ़रमाया कि अली आप के वारिस है। रसूलुल्लाह स.अ. ने फरमाया कि “जिसका मौला मै हु, अली उसके मौला है” इक़बाल चागला ने फिर सैयदना से पुछा कि क्या रसूलुल्लाह स.अ. ने मौलाना अली स.अ. को लोगो के दरमियाँ काइम फरमाया (public anointment)? सैयदना ने फरमाया कि हाँ यह बात सही है।

इक़बाल चागला ने सैयदना से पूछा कि क्या आप ५१ व़े दाई के ख़त से आशना (परिचित) है तो सैयदना ने फरमाया कि एक हद्द तक आशना है। इक़बाल चागला ने फिर पूछा कि क्या अप ५१ व़े दाई के ख़त को देखकर पहचान लोगे? सैयदना ने फरमाया कि ख़त के नमूने देखकर बताया जा सकता है।

इक़बाल चागला ने सैयदना को कुछ बाइंडिंग किये गए कागज़ो को पेश किया, जो हिस्सा सैयदना को बताया गया वह हाथ से की गई लाइन वाले कागज़ पर पेन्सिल से लिखा था। इक़बाल चागला ने सैयदना से पूछा की क्या आप मानते है कि यह ५१ व़े दाई के हाथ से लिखे ख़त है? सैयदना ने फरमाया कि नहीं । इक़बाल चागला ने पूछा कि आप पहचान पाते हो कि यह किसके ख़त है? सैयदना ने फरमाया नहीं।

इक़बाल चागला ने सैयदना से पूछा कि क्या इस कागज़ में यह नहीं लिखा गया कि नस्स खानगी में हो (गोपनीय तरीके से) फिर भी ४ या २ शाहिदो की हाज़री में ही होनी चाहिए(must be done)? जवाब में सैयदना फखरुद्दीन ने फरमाया कि यह नहीं लिखा गया है कि ४ या २ शाहीदो की हाज़री में ही नस्स होनी चाहिए,(must be done) बलके यह लिखा गया है कि ४ या २ शाहीदो की हाज़री में भी नस्स हो सकती है(it may be done), और यह भी लिखा है कि दाई को इस बारे में पूरा इख्तियार है, और जैसे व़े चाहे, कर सकते है।

नामदार जस्टिस गौतम पटेल ने आइन्दा सैयदना के क्रोस एक्जामिनेशन के लिये १३ अप्रैल, २०१८ की तारीख मुक़र्रर की है।

बोम्बे हाई कोर्ट केस के अखबार, फेब्रुअरी १३, १४ और १६ २०१८

अल दाई अल अजल सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. की ज़बानी बोम्बे हाई कोर्ट में १३ वी फेब्रुअरी २०१८ के रोज़ दोपहर १२ बजे शुरू हुइ। सैयदना फखरुद्दीन ने दावत के केस नं ३३७/२०१४ में वादी की हैसियत से गवाही दी। नामदार जस्टिस गौतम पटेल के कोर्ट में कार्यवाही हुइ।

शेह्ज़ादा मुफद्द्ल सैफुद्दीन (प्रतिवादी) के वकील सीनियर काउन्सिल मोहतरम इक़बाल चागलाने सैयदना फखरुद्दीन से कई सवाल पूछे।

१३वि फेब्रुअरी के दिन, प्रतिवादी शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुद्दीन के सीनियर काउन्सिल श्री इकबाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन से पूछा कि सैयदना ताहेर सैफुद्दीन अपनी रिसालत में फरमाते है कि नस “लोगो” के दरमियान होनी चाहिए । सैयदना ने फरमाया कि रिसालत में दरअसल अरबी शब्द “जमाअत” का प्रयोग किया गया है । रसूलुल्लाह स.अ. ने खुद फरमाया है कि एक अकेला मुमिन भी “जमाअत” है (المؤمن وحده جماعة). मनसूस खुद, अकेले ही, नस्स के शाहिद हो तो भी नस्स वैध है।

श्री चागला ने पूछे हुए एक सवाल, कि क्या नस्स स्पष्ट रूप से होनी चाहिए तो सैयदना ने जवाब फरमाया की नस्स स्पष्ट शब्दों में या स्पष्ट इशारे से होनी चाहिए, जैसे दाउदी बोहरा के मिसाक में ज़िक्र आती है ।

१४वि फेब्रुअरी को, श्री चागला ने इस्माइल बिन अब्दुर्रसूल अल-उज्जैनी (अल-मज्दू) द्वारा लिखी गई फेहरिस्त, जिस में इस्लामी उसूल, क़ानून, तारीख और फलसफत पर लिखी गई कई मोअतबर किताबो की फेहरिस्त बनाई गयी है, उस पर सैयदना से सवाल किया कि क्या आप इस फेहरिस्त को आधिकारिक मान्यता देते है, तो सैयदना ने फरमाया कि यह पूर्ण रूप से स्वीकृत नहीं है क्योंकि इसके लेखक ने, जिसे समाज में अल-मज्दू के नाम से जाना जाता है, उस लेखक ने ४० व़े दाई के खिलाफ़ दुश्मनी और बगावत की थी ।

अल-मज्दू के किताब के बारे में श्री चागला के अन्य प्रश्नों को जस्टिस गौतम पटेल ने यह कर अनुमति नहीं दी कि आप पहले यह साबित करें कि क्या बोहरा समाज में अल-मज्दू की किताब को मान्यता प्राप्त है।

आप के इस जवाब के सुबूत के तौर पर अगले दिन १६ फेब्रुअरी को सैयदना ने कोर्ट में ५२वे दाई सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन रि.अ. के बयान की वीडियो रेकोर्डिंग पेश की जिसमे आप फ़रमाते है कि दुश्मन मज्दू की कोई भी तसव्वुर को मुमिनीन को माननी नहीं चाहिए और उसके सभी लेखो से बहुत संभालना चाहिए।

श्री चागला ने कोर्ट में ५१ व़े दाई सैयदना ताहेर सैफुद्दीन साहब रि.अ. के बयान की एक ऑडियो रेकोर्डिंग पेश की और शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुद्दीन की तरफ़ से कोर्ट को यह बताया गया कि इस रेकोर्डिंग में नस्स के बारे में ५१ व़े दाई यह फरमाते है कि नस्स के शाहिदों का होना ज़रूरी है । सैयदना फखरुद्दीन की तरफ से इसी रेकोर्डिंग की, कंप्यूटर पर स्पष्ट की हुइ प्रती कोर्ट में पेश करके सुनाई गई, और सैयदना ने फरमाया कि इस रेकोर्डिंग में कहीं भी अन्य शाहीदो की हाज़री ज़रूरी होने की चर्चा ही नहीं है। हकीकत तो यह है कि सैयदना ताहेर सैफुद्दीन ने “शाहीदो” नहीं फरमाया है बल्के आप ने “कागज़ों” फरमाया है जो स्पष्ट सुनाई दिया जाता है। जस्टिस गौतम पटेल ने शब्दों में किये गए इस गंभीर फर्क को नोट कर लिया और कहा कि इसकी अलग तौर पर विशेष जांच होगी।

श्री चागला ने सैयदना से पूछा की क्या २७वे दाई, सैयदना दाऊद बिन क़ुतुबशाह के पास, आप के पद के दावेदार सुलेमान के खिलाफ, अपनी विधिवत नस्स के बारे में  कोई और सबूत मौजूद था, सिवा इस हकीकत के कि आप २६ वे दाई, सैयदना दाऊद बिन अजबशाह के माज़ून थे। सैयदना ने फरमाया कि हाँ, २५ व़े दाई, सैयदना जलाल शम्सुद्दीन ने बयान दिया था कि आप के ख्व़ाब में इमाम ने तशरीफ़ लाकर आप को हुक्म फरमाया कि आप “दोनों दाउद” को, आप के बाद, २६ व़े और २७ व़े दाई के मकाम में काइम करो। सैयदना ने फ़माया की जब २६ व़े दाई ने २७ व़े दाई को अपना मनसूस काइम किया, तब कुछ लोगो ने ऐतराज़ किया। २६ व़े दाई ने ऐतराज़ के लोगो को जवाब दिया कि दरअसल २५ व़े दाई ने ही आपको (२६वे दाई को) सैयदना दाऊद बिन क़ुतुबशाह को अपना मनसूस काइम करने की वसियत की थी।

सैयदना ताहेर फखरुद्दीन ने यह भी कोर्ट को बताया कि ५१वे दाई सैयदना ताहेर सैफुद्दीन ने अपनी रिसालत शरीफ में लिखा है कि सुलैमान सैयदना क़ुतुबशाह के सामने कई सालों तक सजदा बजाता था और मानता था कि आप पर नस्स हुइ है, कुछ साल के बाद उसने दावा कर दिया।

(प्रतिवादी शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुदीन (प्रतिवादी) भी कई सालों तक मूल वादी सैयदना खुज़ैमा कुत्बुद्दीन रि.अ. के सामने सजदा बजाया करते थे, जिसकी विडिओ रेकोर्डिंग बतौर सबूत कोर्ट में पेश की गयी है ।)

माननिय जस्टिस गौतम पटेल ने आगे कार्यवाही के लिये २१ और २२ वी मार्च २०१८ की तारीख़ तय की है और आगे ज़रुरत होने पर १०, ११ व १३ अप्रैल २०१८ को कार्यवाही होगी।

कोर्ट केस के अखबार – ८, ९ और १२ जनवरी, २०१८

अल दाई अल अजल सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. की ज़बानी बोम्बे हाई कोर्ट में ८ वी जनवरी २०१८ के रोज़ दोपहर १२ बजे ऐतिहासिक कोर्ट रूम नं ४६ में शुरू हुइ। सैयदना फखरुद्दीन ने दावत के केस नं ३३७/२०१४ में वादी की हैसियत से गवाही दी। नामदार जस्टिस गौतम पटेल के कोर्ट में कार्यवाही हुइ।

शेह्ज़ादा मुफद्द्ल सैफुद्दीन (प्रतिवादी) के वकील सीनियर काउन्सिल मोहतरम इक़बाल चागलाने सैयदना फखरुद्दीन से कई सवाल पूछे।

इक़बाल चागला ने सैयदना को दाउदी बोहरा के इतिहास की एक किताब मुन्तज़ा उल अखबार में लिखे गए वृत्तान्त सही है या गलत इस के बारे में पूछा। सैयदना ने जवाब दिया कि ज्यादातर यह सही है मगर कई जगह गलतियाँ भी पाई गयी है जिन में से कुछ के बारे में टिप्पणीयां जामेआ सैफ़ियाह द्वारा प्रकशित इस किताब के संस्करण के आखर में हाशिये में प्रकाशित भी हुइ है ।

इक़बाल चागला ने सैयदना से पूछा कि क्या वजह थी जो आप ने शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुद्दीन पर नस्स के ऐलान को नहीं माना । सैयदना ने जवाब फरमाया कि आपने खुद शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुद्दीन को अपने वालिद सैयदना कुत्बुद्दीन के सामने सजदा बजाते हुए कई वर्षो तक देखा है। यह अमल करके शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुद्दीन खुद ने यह स्वीकार किया था कि सैयदना कुत्बुद्दीन को सैयदना बुरहानुद्दीन ने अपना मनसूस काइम फरमाया है और सैयदना कुत्बुद्दीन बावन वें दाई के वारिस है ।

सवालो के जवाब के दौरान सैयदना ने उन दो घटनाओ का भी ज़िक्र किया कि पिछले वर्षों में, सैयदना कुत्बुद्दीन के साथ, जिस तरह शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुद्दीन अनुचित वर्ताव करते थे, तो बावन वें दाई सैयदना बुरहानुद्दीन ने शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुद्दीन के प्रति किस तरह अपनी  नाराज़गी जताई।

पहली घटना : सैयदना बुरहानुद्दीन की १०० वी सालगिरह के अवसर पर, वाअज़ के बाद, जब शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुद्दीन ने दावत की रस्मो के ख़िलाफ़, सैयदना बुरहानुद्दीन को मोआनका करने, (गले मिलकर बधाई देने की रसम) सैयदना कुत्बुद्दीन से पहले ही आगे बढ़ गए तो उसी वक्त सैयदना बुरहानुद्दीन ने शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुद्दीन को मोआनका करने से रोक दिया और सैयदना कुत्बुद्दीन को सब से पहले याद फरमा कर आगे बुलाया और आप से, सब से पहले, मोआनका कर के बधाई स्वीकार की।

दूसरा अवसर : सैयदना बुरहानुद्दीन रि.अ. ने खुद सैयदना फखरुद्दीन को, तब आप के साथ आप की बहन भी मौजूद थी, दोनों को रूबरू फ़रमाया की आप ने अपने फ़रज़न्दो को फरमाया है कि सैयदना कुत्बुद्दीन के बारे में गलत बातें करना बंध करें और जिस तरह पहले एहतेराम करते आये है वैसे ही एहतेराम से सैयदना कुत्बुद्दीन से पेश आये।

इन दोनो जिक्रो को सैयदना ने तब कोर्ट में फरमाया जब इक़बाल चागला ने सैयदना से पूछा कि शेह्ज़ादा मुफद्दल सैफुद्दीन (प्रतिवादी) जिस तरह सैयदना कुत्बुद्दीन के साथ पिछले वर्षों में पेश आते थे, तो क्या उस बात पर कभी सैयदना बुरहानुद्दीन ने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की थी?

नामदार जस्टिस गौतम पटेल ने सैयदना के क्रोस एक्जामिनेशन के लिये १३,१४ और १६ वी फेब्रुअरी २०१८ तय की है।

लीगल अपडेट – कोर्ट केस के अखबार – ता: ८, ११ व १२ दिसंबर २०१७

८ दिसंबर २०१७ के दिन, दोपहर १२ बजे बॉम्बे हाई कोर्ट के तारीखी कोर्ट रूम, रूम नंबर ४६ में अल-दाई अल-अजल सैयदना ताहेर फखरुद्दीन (त.उ.श.) की गवाही शुरू हुई. आपने दावत के केस नंबर ३३७/२०१४ में प्लेंटिफ की हैसियत से गवाही दी. नामदार जस्टिस गौतम पटेल के कोर्ट में यह कार्यवाही हुई.

सैयदना (त.उ.श.) (प्लेंटिफ) ने मुतबर्रक कुरआने मजीद को हाथ में ले कर कसम खाई और बिस्मिल्लाह पढके गवाही शुरू फरमाई.

पहले सैयदना (त.उ.श.) को आपके वकील श्री आनंद देसाई ने सवालात पूछे. नामदार जस्टिस गौतम पटेल ने भी कई सवालात पूछे.

श्री आनंद देसाई ने सैयदना (त.उ.श.) को दाउदी बोहरा कौम के इतिहास के बारे में प्रश्न पूछाs. सैयदना ने फरमाया कि दाउदी बोहरा कौम इस्माईली शिआ है जो इमाम इस्माईल (अ.स.) के अत्बा है और इस्माईली शिआ की मान्यता है कि वारिस पर की गई नस्स को कभी भी बदला नहीं जाता है और न कभी वापस लिया जाता है. यह मान्यता दाउदी बोहरा कौम के अकीदे के बुनियादी उसूलों में से है. यह मान्यता इस्माईली शिआ के अलावा दूसरें लोग जो मूसा काज़िम को इमाम मानते है उनसे अलग है. मूसा काज़िम के अत्बा यह मानते है कि इस्माईल इमाम पर की हुई नस्स वापस ले ली गई और इमाम जाफरुस सादिक (अ.स.) ने मूसा काज़िम पर नस्स फरमाई.

(इस केस के मुद्दों में से एक अति महत्त्व का मुद्दा यह है कि शेहज़दा मुफद्दल सैफुद्दीन (प्रतिवादी/डिफेन्डंट) का यह कहना है कि नस्स बदली भी जा सकती है और वापस भी ली जा सकती है)

उसके बाद श्री आनंद देसाई ने सैयदना से पूछा कि दाउदी बोहरा कौम में इल्म के स्रोत कौन से है. सैयदना ने जवाब फरमाया कि किताबों की तरतीब में सब से ऊँचे स्थान पर कुरआने मजीद है. उसके बाद रसुलुल्लाह (स.अ.व.) की हदीस और अइम्मत के कलाम. दोआतों की किताबों का भी यही दरजा है. सैयदना ने तफसीर फरमाई कि किताबों में जो इल्म है वह लिखित है और उस इल्म का अर्थ जो दोआतों ने मौखिक रूप से अपने बयानो फरमाया है वह सब से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वह किताबों में लिखित इल्म का सही अर्थ है.

सैयदना ने फरमाया कि इस केस में अकीदे के बारे में उमूर में अपनी बात साबित करने के लिए आप ५१ वे दाई सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) और ५२ वे दाई सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन (री.अ.) के मौखिक बयानों और तफसीरों का उपयोग करेंगे.

जस्टिस गौतम पटेल ने सैयदना को पुछा कि नस्स करते समय या उसके बाद क्या यह अनिवार्य है कि अन्य लोगों को भी नस्स के बारे मे सूचित किया जाए ? सैयदना ने फरमाया कि ऐसा ज़रूरी या अनिवार्य नहीं है कि दूसरों को पता हो, और फरमाया कि तारीख में ऐसे कई उदाहरण है कि नस्स करने के बाद उसे अत्यंत गुप्त रखा जाए. इसका एक कारण यह भी है कि मनसूस के खिलाफ के लोग दोआत के सिलसिले में खलल करने की कोशिष न कर पाए.

श्री आनंद देसाई ने सैयदना को पूछा कि जब मन्सूस अपने नास की हयाती में ही अर्थात गादी नशीन होने से पहले ही वफात हो जाए, तो क्या प्रावधान है. सैयदना ने जावाब फरमाया कि जब मन्सूस पर नस्स कर दी जाए तो मन्सूस इस आलम मे – दुनिया मे – उस आला मकाम में पहुँच ही जाते है और फिर जन्नत में भी उसी आला मकाम में पहुँचते है. अगर मन्सूस दाई की हयात में वफात हो जाए तो दाई नस्स कर के दूसरें मन्सूस को काइम फरमाते है. इस बात को साबित करने के लिए सैयदना ने कुछ मिसालें दलील के रूप में पेश की. उन में से एक सुरतुल मरियम की ५३ वी आयत बताई. इस आयत में हारुन (अ.स.) को, जो मूसा नबी (स.अ.) के मन्सूस है, उन्हें कुरआने मजीद में मूसा के मकाम में अर्थात नबी के मकाम में बताया गया है. हारुन (अ.स.) के वफात के बाद मूसा (स.अ.) नबी ने दूसरें मन्सूस को काइम फरमाया.

श्री आनंद देसाई ने सैयदना से पूछा कि इबादत के सजदे में और वह सजदे में जो इमाम और दाई को किया जाता है उसमें क्या फर्क है? सैयदना ने फरमाया कि इबादत का सजदा सिर्फ अल्लाह तआला को किया जाता है. जो सजदा इमाम या दाई को किया जाता है उसे तक्बीलुल अर्द (यानी ज़मीन को चूमना) भी कहते है और यह एहतेराम व अज़मत की निहायत है.

(यह बहुत अहम मसला है क्योंकि सैयदना ने कोर्ट में यह पेश किया है कि सजदा सिर्फ इमाम, या आप के मनसूस जो इमाम बनेंगे, दाई या या आप के मनसूस जो दाई बनेंगे, उन्हें ही किया जा सकता है. शेहज़दा मुफद्दल सैफुद्दीन (डिफेन्डंट) और उनके भाई सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) को सजदा करते थे.)

श्री आनंद देसाई ने सैयदना से यह भी पूछा कि ऐसे कोइ जुमले है जिनका उपयोग दाई और माज़ून को साथ में जोड़ कर संबोधन किया जाता है. सैयदना ने मिसाल की तौर पर इन जुमलों की ज़िकर फरमाई

  • माज़ून दाई के दाहिने हाथ (यमीन) है और दाई के साथ दावत काइम करते है.
  • दाई और माज़ून मुमेनीन के रूहानी बावा और माँ है.
  • माज़ून दाई के सच्चे दोस्त (सदीक) है और मुमेनीन पर शाहिद है.

सैयदना ने उन तस्वीरों के बारे में भी गवाही दी, जो आपने ली थी, जब सैयदना बुरहानुद्दीन (री.अ.) उस मिसाल (सन्देश/पत्र) को पढ़ रहे थे जिसे सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) ने सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) को अपने ही ख़त से लिखा था. सैयदना बुरहानुद्दीन (री.अ.) और सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) इन तस्वीरों में साथ नज़र आते है. उस मिसाल में ५१ वे दाई सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) ने स्पष्ट संकेत दिए है कि सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) ५३ वे दाई काइम होंगे.

नामदार जस्टिस गौतम पटेल ने सैयदना से पूछा कि आप ५१ वे दाई और ५२ वे दाई की वाअज़ों की ऑडियो वीडियो रेकोर्डिंग पर किस वजह से निर्भर होना चाहते है? सैयदना ने जवाब फरमाया कि इन रेकोर्डिंग पर आपका एतेमाद इसलिए है क्योंकि अकीदे के कईं महत्त्व के उसूलों के बारे में उनके बयान आधिकारिक और प्रामाणित है, जैसे:

  • नस्स खानगी या गुप्त तरीके से भी की जा सकती है.
  • मन्सूस अपने आप के लिए और अपने हक में शहादत/गवाही दे सकते है यह बताने के लिए कि दाई ने उन पर नस्स फरमाई है.
  • नस्स इशारे से हो सकती है.
  • एक बार नस्स कर दी जाए फिर वह बदली भी नहीं जा सकती और वापस भी नहीं ली जा सकती.
  • माज़ून का आला मरतबा और माज़ून की विश्वसनीयता साबित करने के लिए.

सैयदना के परिक्षण (अं: एक्जामिनेशन इन चीफ) के बाद शेहज़दा मुफद्दल सैफुद्दीन (डिफेन्डंट) के वकील श्री इकबाल चागला ने सैयदना फखरुद्दीन (...) का परीक्षण (अं: क्रोस एक्जामिनेशन) शुरू किया.

श्री इकबाल चागला ने सैयदना को आपकी हयात के बारे में कई प्रश्न पूछे खास कर के आपकी तालीम के बारे में, आपके निवासस्थान के बारे में, आपके व्यवसाय के बारे में और आपके पारिवारिक मामलों के बारे में.

श्री चागला ने सैयदना को दावत के उन असरार और खास इल्म के बारे में पूछा जिस इल्म से सैयदना कुत्बुद्दीन ने आपको नवाज़ा और यह भी पूछा की यह इल्म देने का उद्देश्य क्या था. सैयदना ने जवाब फरमाया कि यह खास इल्म आपको इसलिए बख्शा गया ताकि आप दाई और दावत की खिदमत कर सके. श्री चागला ने पूछा कि सैयदना कुत्बुद्दीन को सैयदना फखरुद्दीन से, दाई और दावत की खिदमत की कैसी उम्मीदें थी. सैयदना ने जवाब दिया कि यह उम्मीद थी कि जिस तरह सैयदना कुत्बुद्दीन ने दाई और दावत की खिदमत की, इखलास व नशात से, उसी तरह आप भी खिदमत करे.

श्री चागला ने सैयदना से पूछा कि जब कभी यह विवाद हो  कि दाई कौन है, तो इस इख्तिलाफ को सुलझाने में माज़ून की क्या भूमिका होती है? सैयदना फखरुद्दीन ने फरमाया कि इतिहास में हुए ऐसे विवाद के समय में माज़ून के कौल (कथन) को मौतमद (विश्वसनीय) और आधिकारिक माना गया है.

सैयदना से पूछा गया कि आपको कब यह मालूम हुआ के आपके वालिद ५३ वे दाई सैयदना कुत्बुद्दीन ५२ वे दाई सैयदना बुरहानुद्दीन के वारिस है. आपने फरमाया कि यह एहसास धीरे धीरे होता गया. छोटी आयु से धीरे धीरे यह मालूमात हासिल हुई और ५२ वे दाई के शेहजादें व शेहज़ादियां जिनमें शेहज़दा मुफद्दल सैफुद्दीन (डिफेन्डंट) भी शामिल है, वे सब सैयदना कुत्बुद्दीन को सजदा करते थे और ५२ वे दाई और सैयदना कुत्बुद्दीन को साथ में “बेवे मौला” (दोनों मौला) कह कर संबोधित करते थे। आपने फरमाया कि इन आमाल से भी मुझे इल्म हुआ.

श्री चागला ने सबूत के तौर पर अख़बार में प्रकाशित हुए एक लेख को कोर्ट में पेश किया. पहले इसी लेख को सैयदना कुत्बुद्दीन ने अपने प्लेंट (वाद-पत्र) में पेश किया था लेकिन उस समय शेहज़दा मुफद्दल सैफुद्दीन (डिफेन्डंट) ने इसे कबूल नहीं किया था. इस लेख में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस) नामदार जस्टिस अज़ीज़ अहमदी द्वारा जारी किये गये बयान का उल्लेख था कि, “मैंने दस्तावजों को गौर से पढ़ा और जांचा है और इस निष्कर्ष पर आया हूँ कि सैयदना कुत्बुद्दीन का कहना कि वे ५३ वे दाई है, यह सिद्धांतों पर आधारित है.” (“ I examined the documents and I beleive that Syedna Qutbudin’s stand of the 53 rd Dai is principled”)

जस्टिस गौतम पटेल ने इस लेख को शेहज़दा मुफद्दल सैफुद्दीन (डिफेन्डंट) का दाखला (exhibit) मानते हुए मंज़ूर किया है और रेकॉर्ड पर ले लिया है.

जस्टिस गौतम पटेल ने सैयदना फखरुद्दीन (प्लेंटिफ) के परिक्षण (cross examination) के लिए तारीख ८,९ और १२ जनवरी, २०१८ निर्धारित की है.